गौतम कुमार की रिपोएर्ट ;
क्या इस दीवाली 'मिट्टी के इंजिनियर्स' के घर भी होगा लक्ष्मी का आगमन ?
डेहरी अनुमंडल के विभिन्न क्षेत्रों में दीपावली पर हर व्यक्ति अपने घर लक्ष्मी आगमन की कामना करता है और उनकी राह ताकता है। दीपावली वह मौका होता है जब दियों की रौशनी में लोग मां लक्ष्मी और गणेश का पूजन कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन दिवाली पर जलने वाले दियों से लेकर लक्ष्मी गणेश की मूर्तियों को बनाने वाले कुम्हारों के यहां धन की देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद नहीं मिलता। जिनके प्रयासों से सैकड़ों घरों में माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है, उनका घर सूना ही रहता है।
हर बार की तरह इस बार भी कुम्हार अपने घर में लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों के साथ-साथ दियों को तैयार किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार इनके आंगन में भी धन की वर्षा होती है या नहीं। इन कुम्हारों की सुख समृद्धि में सबसे बड़ी बाधक बन गई है चाइनीज झालर। इन झालरों ने घर-घर तक इस कदर अपनी पहुंच बना ली है कि इनका दिया अब घरों में पहुंचना मात्र औपचारिकता रह गया है।
डेहरी शहर के त्रिगुण मोड़ में दिया बनाते हुए कारीगर दिनेश प्रजापति, नरेश प्रजापति, सुरेश और संजय प्रजापति बताते हैं कि वह हर साल दिए बनाते हैं, मगर चाईनीज झालरों ने उनके इस कारोबार को खत्म कर दिया है. लोग दियों की खरीद तो करते हैं, लेकिन सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए क्योंकि पूजा बगैर दियों की होती नही है। इस बार फिर यह दिए बना रहे हैं कि वह खूब बिकें। दिए जितने बिकेंगे उन्हें उतना लाभं होगा और लक्ष्मी का आगमन और उनकीं कृपा उतनीं ज्यादा रहेगी। इस आशा के साथ यह अपने काम में लगे हुए है कि शायद इस बार उनके दिए ज्यादा बिक जाएं तो इनके घरों में भी इस बार सुख-समृद्धि आ जाए।
झाबरमल गली निवासी मूर्ति निर्माता ओमप्रकाश प्रजापति और भरत कुमार प्रजापति बताते हैं कि सरकार उनके बारे में सोंच नहीं रही। अगर सरकार उनके बारे में कुछ विचार करे तो उनका घर भी खुशियों से भर जाएगा। यह लोग बताते हैं कि बड़ी मुश्किल से उन्हें चार से पांच हज़ार रुपये ही मिल पाते हैं। इतने कम लाभ में उनका घर चलाना मुश्किल है। जबकि महंगाई मुंह फाड़े खड़ी है। इनकी मुश्किल कम मुनाफे में ही खत्म नही हो जाती। बल्कि इन्हें कई जगह चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ता है। इन सभी कारीगरों ने बताया कि दीवाली में दिया बेंचने के लिए जो दुकान लगानी पड़ती है उसके लिए उन्हे बाजारों में चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। सरकार को चाहिए कि उन्हे दुकान लगाने के लिए कम से कम जगह की व्यवस्था करवा दे तो उन्हें इसके लिए चढ़ावा नही चढ़ाना पड़ेगा।
इस काम में लगे गणेश और लक्ष्मी जी के मूर्ति एवं दिया बनाने वाले कारीगर ओमप्रकाश प्रजापति एवं उनका एम बि ए पढ़ाई किया हुआ पुत्र भरत कुमार बताते है कि आज से पन्द्रह-बीस साल पहले इस काम में उन्हें काफी फायदा होता था। मगर आज इस काम में चाइना की घुसपैठ ने मुनाफे को काफी कम कर दिया है। आज लोग घरों में दिए से रौशनी करना अपने आप को गुजरे जमाने का और पिछड़ा समझते है। लोग समझते हैं कि चाईनीज झालर की रौशनी में उनका रुतबा बढ़ेगा। इसलिए आज घी और तेल के दिए जिनसे पर्यावरण भी शुद्ध होता है का ज़माना अब चला गया है। अब तो रोज़ी रोटी के भी लाले इस काम में पड़ गए हैं।

