मछली पालन के माध्यम से मलेरिया एवं फैलेरिया आदि बीमारियों के नियंत्रण का सुझाव


 गौतम कुमार की रिपोर्ट ;-

डेहरी /रोहतास  
रोहतास जिले के जमुहार स्थित गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित मत्स्य विज्ञान विभाग, नारायण कृषि विज्ञान संस्थान द्वारा मछली पालन के माध्यम से मलेरिया एवं फैलेरिया आदि बीमारियों के नियंत्रण का सुझाव दिया गया है‌। संस्थान के द्वारा संशोधित एवं प्रतिपादित लेख से यह स्पष्ट है कि गंबुसिया मछली मलेरिया ,फाइलेरिया आदि बीमारियों के नियंत्रण के लिए अत्यधिक उपयोगी एवं लाभप्रद सिद्ध हुए हैं ।उपरोक्त जानकारी देते हुए मत्स्य विज्ञान विभाग नारायण कृषि विज्ञान संस्थान की सहायक प्राध्यापक सूचीस्मिता एवं मनोज कुमार ने बताया कि गम्बुसिया मछली उत्तरी अमेरिका तथा लेबीस्टीस मछली दक्षिण अमेरिका में पाई जाती है ।गंबुसिया मछली सन 1928 में भारत लाई गई थी ।इसका वैज्ञानिक नाम गंबुसिया एफीनीस है।उन्होंने बताया कि 24 घंटे में 27 से एक-सौ मच्छरों के लार्वा को खाती है एवं प्रतिवर्ष कम से कम 10 बार प्रजनन करती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखती है इस कारण इसे रोग की रोकथाम हेतु रुके हुए पानी में संचित किया जाता है। इसी प्रकार लेबीस्टीस मछली भी उपरोक्त कार्य के लिए उपयोगी है जो लार्वा का भक्षण करती है‌ ।इसका वैज्ञानिक नाम बारबेडोस मिलियंस है। इसमें भी लाखों की संख्या में अंडे देने की क्षमता होती है। इसे साधारण भाषा में गप्पी मछली भी कहते हैं। उन्होंने बताया कि गंबुसिया मछली छोटे-छोटे जलीय कीड़ों , मच्छरों के लार्वा एवं ईल्ली का भक्षण करते हैं जिससे मलेरिया फाइलेरिया रोग की रोकथाम के लिए जैविक नियंत्रण संभव हो पाता है ।इस मछली को बारहमासी एवं बरसात में रुके हुए छोटे-छोटे गड्ढों के पानी तथा गंदे पानी के नालों में डालते हैं जहां पर मच्छर अपने अंडे देते हैं। ऐसे स्थानों में रुके हुए पानी के ऊपर मच्छर अपने अंडे देते हैं जिन्हें गंबुसिया मछली अपना भोजन बना लेती है। उन्होंने बताया कि मछली के इस क्रिया के कारण फाइलेरिया और मलेरिया रोग के नियंत्रण में सहायता मिलती है।