कमलेश कुमाए मिश्रा की रिपोर्ट;-
डेहरी डालमियानगर बिहार के तमाम जन संगठनो द्वारा पीपुल्स मेनिफेस्टो निर्माण के दौरान मजदूर और पलायन पर बोलते हुए पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि कोरोना महामारी के फैलाव और लॉकडाउन की लंबी अवधियों के बीच भारत में श्रमिकों के हालात और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान और श्रम रोजगार से जुड़ी राजनीतिक, आर्थिकी के कुछ अनछुए और अनदेखे अध्याय भी खुल गए हैं। पहली बार श्रम शक्ति की मुश्किलें ही नहीं, राज्यवार उससे जुड़ी पेचीदगियां भी खुलकर दिखी हैं। एक साथ बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों का अपने घरों को लौटने के असाधारण फैसले के जवाब में राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के पास कोई ठोस कार्रवाई या राहत प्लान नहीं दिखा, जिससे समय रहते हालात सामान्य हो पाते। प्रवासी मजदूरों के बीच जान बचाने और अपने घरों को लौट जाने की देशव्यापी दहशत के बीच सरकारों की मशीनरी भी असहाय सी दिखी। प्रोफेसर मनीष झा ने कहा कि कोरोना ने उनको एक वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया,देश ने उनकी खतरनाक यात्रा देखी, कैसे वे बस व ट्रेन से कुचले जा रहे है, उनको पहली बार एक राजनैतिक मुद्दा के यूज में देखा गया व मीडिया की गहन दृष्टि भी गयी। खाद्य सुरक्षा बिल को जबाबदेह बनाना होगा। सरकार मनरेगा को और सशक्त बनाये व मजदूरों को एक छोटा ही सपोर्ट ही दिया जाए। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कॉमरेड आर एन ठाकुर ने कहा कि सरकार को पलायन के मुद्दे पर गम्भीर होना होगा। करोड़ो श्रम दिवस कहाँ गए। बरसात में मनरेगा के काम बंद है। मजदूरों का पंजीकरण होना चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री और विधान पार्षद प्रोफेसर संजय पासवान ने कहा कि, हालांकि ये भी एक सच्चाई है कि भारत में प्रवासी मजदूरों की स्थिति विभिन्न राज्यों के असमान विकास के साथ जुड़ी हुई है। मजदूरों की मनोदशा के अलावा, उन्हें काम देने वाले उद्यमों की जरूरत को भी समझने की जरूरत है। सच्चाई ये भी है कि, सरकारें सहानुभूति दिखा सकती हैं, लेकिन खर्च वही कर सकता हैं, जो उनके पास है। राज्यों को इस तरह का विकास करने की जरूरत है कि, उनके पास जरूरी कुशल मजदूर रहें, उन्हें उचित मजदूरी मिले और मजदूरों का कल्याण भी हो। अप्रैल में केंद्र सरकार ने गरीबों और जरूरतमंदों के लिए 1.70 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज का ऐलान किया था। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों ने एक व्यापक वित्तीय पैकेज की मांग उठायी है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में एक कार्यबल का गठन कर दिया है। संचालन करते हुए अजय झा ने कहा कि जन घोषणा पत्र मे निम्न बातो को रखने पर सहमति बनी है कि, बिहार से बाहर जाने वाले सभी मजदूरों का पंजीकरण अनिवार्य हो। पंजीकरण का कार्य पंचायत स्तर पर हो, जिला स्तर पर नही। इस काम का जिम्मा जिलाधिकारी का न हो, पंचायत का हो। राज्य के जीडीपी में एक तिहाई योगदान मजदूरों का हो। श्रम कानूनों में संशोधन वापस लिया जाए। मीटिंग में डॉ शम्भू शरण सिंह, सुनील कुमार सिंह, गोपाल कृष्ण, वंदना शर्मा, दीनबंधु वत्स, संतोष उपाध्याय आदि ने भी अपने विचार रखे।
